चला था ज़िन्दगी के सफर में अकेला
न कोई मंज़िल थी न कोई ठिकाना
फिर आया एक मोड़
अपने सब बंधनों को छोड़
तुमने थामा जो मेरा हाथ
किया इक वादा निभाने का जो साथ
बदल गयी ज़िन्दगी, मिल गया किनारा
ये ही दुआ है कभी साथ न छोटे हमारा
आओ प्रिये चुने शब्दों का ऐसा जाल
हंसी ख़ुशी कटते रहें दिन महीने साल
तुम मुस्कुराती रहो हर पल
बस यही चाहता है विपल!
न कोई मंज़िल थी न कोई ठिकाना
फिर आया एक मोड़
अपने सब बंधनों को छोड़
तुमने थामा जो मेरा हाथ
किया इक वादा निभाने का जो साथ
बदल गयी ज़िन्दगी, मिल गया किनारा
ये ही दुआ है कभी साथ न छोटे हमारा
आओ प्रिये चुने शब्दों का ऐसा जाल
हंसी ख़ुशी कटते रहें दिन महीने साल
तुम मुस्कुराती रहो हर पल
बस यही चाहता है विपल!
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